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Economy News In Hindi : The country’s pharma companies refrained from taking the name of China, its effect was seen in the January-March quarter earnings call | देश की फार्मा कंपनियों ने चीन का नाम लेने से किया परहेज, जनवरी-मार्च तिमाही की अर्निंग कॉल में दिखा इसका असर

  • चीन की फैक्टरी फिर से शुरू होकर पुराने ऑर्डर को पूरा कर रही हैं
  • डॉ. रेड्‌डीज लैब जेनरिक ड्रग निर्यात करनेवाली पहली भारतीय कंपनी

दैनिक भास्कर

Jun 04, 2020, 06:19 PM IST

मुंबई. देश की फार्मा कंपनियां चीन का नाम लेने से भी अब परहेज कर रही हैं। भारत की फार्मा कंपनियों ने 2019 की अक्टूबर-दिसंबर तिमाही में अर्निंग कॉल में जो अनुमान लगाया था, वह अब बदल गया है। विश्लेषकों का मानना है कि यह कंपनियां अब चीन जाने से कतरा रही हैं। इसका असर इनके अर्निंग कॉल में दिखा है।

अक्टूबर-दिसंबर तिमाही में 42 बार चीन का नाम अर्निंग कॉल में लिया था

दरअसल विश्लेषकों ने ऐसा अनुमान लगाया था कि बल्क ड्रग्स की आपूर्ति बढ़ेगी। लेकिन पूरा अनुमान कोविड-19 के चलते बदल गया है। जनवरी मार्च 2020 की तिमाही में फार्मा कंपनियों ने अर्निंग कॉल में चीन का शब्द ही गायब कर दिया है। इन कंपनियों के अर्निंग कॉल के ट्रांसक्रिप्ट से पता चलता है कि 2020 की तीसरी तिमाही के अर्निंग कॉल में कुल 42 बार चीन का नाम लिया गया था। जबकि चौथी तिमाही में यह घटकर 4 पर आ गया।

डॉ. रेड्‌डीज लैब ने 14 बार चीन का नाम लिया

ट्रांसक्रिप्ट के अनुसार तीसरी तिमाही में डॉ. रेड्‌डीज लैब ने अर्निंग कॉल में 14 बार चीन का नाम लिया था। जबकि चौथी तिमाही में यह घटकर 3 बार आ गया। सन फार्मा ने इसी अवधि में 13 बार नाम लिया और यह घटकर एक बार पर आ गया। सिप्ला ने जहां तीसरी तिमाही में 7 बार नाम लिया, वहीं चौथी तिमाही में इसने एक बार भी नाम नहीं लिया। ल्युपिन ने तीसरी तिमाही में 3 बार नाम लिया जबकि चौथी तिमाही में एक भी बार नहीं लिया। इसी तरह अरबिंदों फार्मा ने भी तीसरी तिमाही में 5 बार नाम लिया। हालांकि इसके चौथी तिमाही के अर्निंग कॉल का ट्रांसक्रिप्ट का पता नहीं चल पाया है।

दवा कंपनियों ने चीन में विस्तार की योजना टाली

विश्लेषकों के मुताबिक इसके पीछे जो कारण हैं उसमें एक तो लॉकडाउन की वजह से चीन से आनेवाली बल्क ड्रग्स की सप्लाई पर कोई असर नहीं पड़ा। दूसरा भारत की दवा कंपनियों ने चीन में अपने विस्तार की योजना को टाल दिया है। इसके अलावा चीन की फैक्टरी फिर से शुरू होकर पुराने ऑर्डर को पूरा कर रही हैं। इसलिए कई महत्वपूर्ण इंग्रेडिएंट्स की कीमतों में इजाफा होने की आशंका भी खत्म हो गई है।

एपीआई पार्क की स्थापना अभी भी नहीं हो पाई

ल्युपिन के एमडी निलेश गुप्ता कहते हैं कि चीन में लॉकडाउन के कारण वहां से आनेवाले कच्चे माल की सप्लाई में भी बड़ी गिरावट हो सकती है। भारत में एक्टिव फार्मा इंग्रेडिएंट्स (एपीआई) पार्क की स्थापना की बात करनेवाली सरकार इस पार्क को हकीकत में जब तक स्थापित नहीं करेगी तब तक चीन से जरूरी आयात का कोई विकल्प नहीं मिलने वाला है।

पिछले साल कई कंपनियों ने ज्वाइंट वेंचर किया था

बता दें कि 2019 में काफी फार्मा कंपनियों ने संयुक्त वेंचर के जरिए चीन के बाजार में प्रवेश भी किया था। सन फार्मा, सिप्ला, अरबिंदो फार्मा, जीएसके, स्ट्राइड्स फार्मा और अलेंबिक फार्मा चीन में उत्पाद लांच करने के लिए संयुक्त उपक्रम की स्थापना की थी। पिछले सितंबर में चीन के सरकारी अस्पताल ने ओलेंजेपाइन की सप्लाई करने का टेंडर डॉ. रेड्‌डीज लैब ने जीता था। इसी के साथ वह देश में जेनरिक ड्रग की निर्यात करनेवाली पहली कंपनी बन गई थी।

पिछले साल चीन में संभावनाएं देख रही थीं भारतीय कंपनियां

इसके अलावा कई अन्य फार्मा कंपनियां भी चीन के बाजार में प्रवेश की योजना बनाई थी लेकिन स्पेशियालिटी प्रोडक्ट्स के लाइसेंसिंग सीमित होने के कारण इसका लाभ मिलने में अभी दो से तीन साल का समय लग सकता है। डॉ. रेड्‌डीज, सन फार्मा और सिप्ला ने 2019 के जनवरी-मार्च तिमाही में रिजल्ट जारी करते समय चीन के बाजार में संभावनाओं को तलाशने का विकल्प देख रही थीं। लेकिन इसके एक साल बाद 2020 की जनवरी-मार्च तिमाही में उनकी डिक्शनरी से चीन का शब्द गायब हो गया है।

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