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Patna News In Hindi : The election of 1985 tells that Netagiri is not a matter of common man | 1985 का चुनाव बता गया नेतागिरी आम आदमी के बूते की बात नहीं

दैनिक भास्कर

Jul 06, 2020, 08:44 AM IST

पटना. (भैरव लाल दास)  1985 में हुए बिहार विधानसभा चुनाव ने बिहार में सामाजिक और राजनीतक परिवर्तन का नया दौर शुरू कर दिया। चुनाव लड़ना या नेतागिरी करना अब सामान्य व्यक्ति के बूते की बात नहीं रहने वाली थी। चुनाव पूर्व दलसिंहसराय, बेतिया, सीतामढ़ी, सिवान, वारसलीगंज, मोतिहारी तथा विक्रमगंज में हुई हिंसक घटनाएं संकेत देने लगी थीं कि अब ‘बैलट’ पर ‘बुलेट’ भारी पड़ेगा। बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री कर्पूरी ठाकुर ने अपने समर्थकों से कहा कि वे कानूनी या गैर-कानूनी, जैसे भी हो, हथियार इकट्‌ठा कर लें। यदि कांग्रेस के गुंडे बूथ लूटने की कोशिश करें तो जान पर खेलकर भी लोकतंत्र की रक्षा करें। मुख्यमंत्री चंद्रशेखर सिंह ने उनके इस बयान की तीव्र निंदा की थी। 
मसौढ़ी के कांग्रेस-आई उम्मीदवार जनेश्वर प्रसाद सिंह की हत्या उनके चुनाव कार्यालय में कर दी गई। उनके समर्थकों ने दमकिपा पर हत्या का आरोप लगाया। आईपीएफ समर्थक, हटिया विधानसभा क्षेत्र के निर्दलीय प्रत्याशी विष्णु महतो की हत्या कर दी गई। परिवार वालों ने आरोप लगाया कि कांग्रेस-आई के उम्मीदवार द्वारा उन्हें चुनाव में खड़ा नहीं होने के लिए पैसों का लोभ भी दिया गया था। चुनाव के एक दिन पूर्व नालंदा के निर्दलीय महेन्द्र प्रसाद की हत्या उनके घर में ही कर दी गई। उनका कोई आपराधिक इतिहास नहीं था। बोकारो के निर्दलीय बनवारी राम की रहस्यमय मृत्यु हो गई। वह सोए ही रह गए।

चुनाव पूर्व निर्वाचन आयोग के सचिव का पटना में कैंप
चुनाव पूर्व ही निर्वाचन आयोग के सचिव आरपी भल्ला पटना में कैंप कर लिए क्योंकि यहां बड़े पैमाने पर हिंसा की आशंका थी। मुख्य सचिव केके श्रीवास्तव के साथ मिलकर पूरे बिहार को पांच जोन में बांटने और प्रत्येक बूथ पर स्थायी पुलिस बंदोबस्ती का निर्णय लिया गया। पारा मिलिट्री फोर्स की 200 कंपनी, सीआरपीएफ और बीएसएफ की 96 कंपनियों की तैनाती से यह साफ हो गया कि बिहार पुलिस और होमगार्ड के एक लाख से अधिक जवान लोकतंत्र के पवित्र प्रतीक ‘बैलट’ की रक्षा करने में सक्षम नहीं रह गए हैं। प्रशासनिक व्यवस्था में भी कमी नहीं की गई। 54000 लोगों को सीआरपीसी की धारा 107 के अंतर्गत नोटिस तामिला किया गया। 3,665 लोगों से सुरक्षा हेतु बॉण्ड बनवाया गया। नेशनल सिक्युरिटी एक्ट (एनएसए) के तहत 77 लोगों की गिरफ्तारी का आदेश निकाला गया, 390 लोगों को बिहार क्राइम कंट्रोल एक्ट के अंतर्गत और 2719 आपाराधिक प्रवृत्ति के ऐसे लोगों को चिह्नित किया गया जिनसे चुनाव प्रभावित हो सकता था। चुनाव के दिन करीब 1000 लोगों की धर-पकड़ भी की गई। बूथ पर उपद्रव करने वालों को देखते ही गोली मार देने का आदेश और उपद्रव करनेवाले ग्रामीणों पर सामूहिक जुर्माना की व्यवस्था भी की गई। 

हिंसा की 1370 घटनाओं में 69 लोग मरे
चुनाव में हिंसा की कुल 1370 घटनाएं दर्ज की गईं, जिसमें 69 लोग मारे गए और 242 व्यक्ति घायल हुए। मतदान तिथि के पहले हिंसा की 37 घटनाएं हुईं, जिसमें 11 लोग मारे गए, 13 घायल हुए। मतदान के दिन 310 वारदात हुईं, जिनमें 49 व्यक्ति मारे गए और 29 घायल हुए। चुनावकर्मियों द्वारा भी बूथ लूट की गई। मुंगेर के खड़गपुर निर्वाचन खेत्र के बूथ संख्या 132,133 व 134 पर सभी निर्वाचन कर्मियों को गिरफ्तार कर लिया गया, क्योंकि चुनाव से एक रात पहले ही वे मतपत्र पर मुहर मारकर बक्सा में डाल चुके थे। बख्तियारपुर, मधेपुरा और बेनीपट्‌टी के बूथों पर भी ऐसी ही घटनाएं हुईं। 

चुनाव में कांग्रेस को मिला पूर्ण बहुमत

1985 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस ने 323 उम्मीदवार खड़े किए उनमें से 196 जीते। लोकदल ने 261 उम्मीदवार खड़े किए, उनमें 46 जीते। जनता पार्टी ने 229 उम्मीदवार खड़े किए, उनमें 13 जीते। भाकपा ने 167 उम्मीदवार उतारा, 12 सीटें जीतीं। माकपा ने 44 सीटों पर उम्मीदवार खड़े किए, 1 सीट मिली। आईपीएफ 85 सीटों पर लड़ा,उसका एक भी उम्मीदवार नहीं जीत सका। भाजपा ने 234 सीटों पर उम्मीदवार खड़े किए, 16 सीटें मिलीं। झामुमो 57 सीटों पर लड़ी, 9 जीती। 

बदल गई जातिगत स्थिति

1985 में हुए बिहार विधानसभा चुनाव के बाद सदन की जातिगत स्थिति में परिवर्तन हुआ। ब्राह्मण-30, भूमिहार-38, राजपूत-46, कायस्थ-4, यादव-47, हरिजन-48, आदिवासी-30, मुसलमान-33, कुर्मी 12, कोईरी-18, बनिया-9, नाई-1, मल्लाह-2 चुनकर आए। ऊंची जाति के विधायकों की संख्या 118 और पिछड़ी जाति के विधायकों की संख्या 88 थी। इस चुनाव के पूर्व प्रत्याशियों के भाग्य का फैसला उनकी जाति, राजनीतिक दल, विचारधारा और अपने निर्वाचन क्षेत्र के मतदाताओं के साथ घनिष्ठता के आधार पर होता था। इस चुनाव के बाद यह साफ होने लगा कि राजनीतिक क्षेत्र में मजबूती से टिके रहने के लिए अन्य चीजों के साथ-साथ पैसा और बंदूक ही विश्वस्त समर्थक पैदा कर सकते हैं। चुनाव के पूर्व ही यह स्पष्ट होने लगा था कि बूथ लूटने अथवा बूथ लूट से बचाने के नाम पर सामूहिक ठेकेदारी का प्रचलन आरंभ होने वाला है। कालांतर में संस्थागत रूप से आपराधिक गिरोहों को जन्म देने में इन ठेकेदारों की बड़ी भूमिका रही। इन्हें जाति, राजनीतिक पार्टी या विचारधारा से कोई मतलब नहीं था।

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